छत्तीसगढ़ी म पढ़व- ‘अपने मन के चलत रहिबे त होगे न बिंदरा बिनास’

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जीव के आधार काय. मन्थिर काहत रिहीस के चालंव कइसे. चालत ले ढुरू- ढुरू मन एके जगा सकलावत रइथें. अउ एक दूसर ला दुलरावत रइथें. देख ले संसार ला अउ जान ले बयपार ला नइते नफा नकसान के जानबा नइ होए पाही अउ भितरे भीतर चुरत रहिबे अउ दुबरावत रहिबे.

चल दिन कहिके निस्फिकर हो जाथें गा
भइगे माढ़े राह रे जीव अईस कहिके ओन्हा कोन्हा ला झांकत राह. झांके ताके मा कतकोन जीव अपने अपन अपमान ला झेलत रइथें. झेलना सबो दिन बर नइ रहना चाही. झेलत झेलत उम्मर ला कब थका दिही तेला ते कइसे जानबे.

एक्के कोती रईही तेन एकंगू हो जाही
रोटी पोबे त ओला अल्थी- कल्थी मारत रहना चाही . नइते रोटी ला रोटी बने ना कई जनम धरे ला परही. जरगे तहां गय, जरगय तहां गय . एक्के उदाहरण देके अपन बात ला जान लवके एंकगू झन होवय जिनगी के पलवा. डंडा ला बने सोझियाए धरे रा तभे तोला बुढ़ापा मा सहारा मिलही. बुढ़त काल के तियारी जवानी मा होते रहना चाही. फेर अपनेच मन के चालत रहिबें त कइसे अपनेच मन के चालत रहिबे त. कइसे बनही ‘

वोहू दिन बहुर के आही
झन संसो मा परे रा कांही न कांही उदिम मा लागे राह. लागे रहिबे त ऐती तेती होए के डर नइ राहय. एती तेती होए बरतें हा अपनेच मन के चालत रेहे अउ आज पछतावा होवत होही.

सियानहा के रद्दा ला धर के रेंगव
चलव आज के आज परन करना चाही के सियनहा के सियानी बने राहय.

(मीर अली माीर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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