छत्तीसगढी म पढ़व: ममा दाई के मया

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देवर-देरानी, ननंद सब ल एक नजर ले देखत हे. ओखर मया सब बर छलकत रहिथे. दूसर बहू बेलासपुरहिन आय. ओखर नाव हे बिजली. जइसे नाव वइसने वोहा चमक-चाँदनी हे. चमकत-दमकत रहिथे. ओखर ददा मंगलू बपुरा सीधा हे. बेटी के ठसका हे. ना लिपे के, ना पोते के, ना रांधे के, ना चुरोय, ना पऊरसे के. जिहां देखबे तिहां बस जबानी लाई फोरत दिखथे. देश-दुनिया के रंग-रंग के गोठ गोठियाय म बड़ हुशियार हे. कखरो ना सुने, ना गुने अपने तन-मन के हे. हिजगा पारी म अव्वल. खाय-पिये म अड़बड़ चिक्कन हे. नबर एक के बातूनी. सास चिल्लावत रहिथे वोहा कान नइ देय. एक कान ले सुन, दुसर कान ले निकाल इही वोखर फार्मूला हे.

ममा दाई के मंझला बेटा अउ बिजली के डउका (पति) ढेलाराम तहसील आँफिस म चपरासी हे. रोज कुछ न कुछ ऊपरी आमदनी होई जथे. ढेलाराम अपन डौकी ऊपर लट्टू हे. ओखर खिलाफ कोनो बात नइ सुनना चाहे. ममा दाई (नानी) के फटकार ओला बिख बरोबर लगथे. बिजली के खिलाफ बोलइया मन ल वुही झर्रा देथे. ममादाई संग त ओखर कभू पटबे नई करिस. बेटा अउ पोता के मोह म ममा दाई अरझ के रही जथे. बिजली के सास बिचारी चिल्लावत रहिथे वोहा कान नइ देय. सास ह जाहर के घूंट पी के कलेचुप रहि जथे. बिजली बिहा के अइस तेखर एक बरस होय रिहिस भगवान ओला कृष्ण कन्हैया बरोबर सुंदर बाल-गोपाल दिस.ओखर नाव घलो रखागे कन्हैया. टूरा के मायाजाल के फांदा म मोर ममा-दाई घलो फन्दागे.

सबले छोटे बेटा कम पढ़े लिखे हे. खेतिहर हे. दिन-रात अपन डौकी-लइका संग खेती के बुता म भिड़े रहिथें. ओखर डौकी के नाव पारबती हे. भेलई ले आय हे. ओखर ददा ह बी.यस.पी. म नौकरी करके साल भर पहिली रिटायर होय हे. खेती यही कोई तीन-चार एकड़ हे. सबके चूलहा एके हे. ममा-दाई के ये सबले छोटे बेटा रतनलाल सिरतोन रतन बरोबर हे. सादा-नर्बदा जीवन जियत हें. अपन दाई के फ़िकर करथे. सेवा करइया सेवकराम आय. बहू घलो संहराय के लइक हे. छोटे बहू बेटा के कोरा म एक बरस के नोनी लछमी खेलत हे.

ममा शांत होइस तब लोग-लइका मन छोटे-छोटे रिहिन. तब बड़े ममा नवा-नवा गुरूजी बने रिहिस. ममा दाई अउ बड़े ममा उप्पर परवार के भारी जवाबदारी रिहिस. इनकर पालन-पोसन करना, शिक्षा-दीक्षा देना, बर-बिहाव करना चुनौती रिहिस. फेर बड़े बहू सोला आना मिलगे. गउ माता कस सीधा. पूरा परवार के सुख दुःख के खबर लेवइया. ना नू कभू नई करिस. सास के पूरा-पूरा संग देवत गिस. सदा सास ल महतारी ले बढ़के मान दिस.

मैं ममा दाई के सबले छोटे नोंनी फूलबती के बेटी बैसखिंन आंव. ममा दाई के कोरा के खेलौना. अपन बेटी फूलबती ल एक दिन ममा दाई किहिस- ‘बेटी, बैसखिंन ल मोर गोदी म डार दे. एखर पढ़ई-लिखई, पालन-पोसन अउ बर बिहाव के पूरा जवाबदारी मोर होही. तोला एखर कोनो किसम के चिंता करे के जरूवत नइ हे. तोर ददा के गुजरे के बाद घर सुन्ना-सुन्ना लागथे. बड़े बहू ल भगवान अभी तक चिन्हे नइ हे. सब ले मयारूक हे. फेर ओखर एको नोंनी-बाबू नइ हे. कोख सुन्ना हे. दुःख बड़े हे. तोर नोंनी ल मेंह राख लेहूँ त ओखर ममा-मामी के मन घलो मन माड़ जही.’

बेटी-दमाद दुनों आपस म गोठियाइंन अउ राजी होगें. नानपन ले मैं अपन ममा दाई, ममा अउ बड़े मामी के मया म पढ़-लिख के जवान होय हंव. सरकारी नौकरी बर एड़ी.चोटी एक करत हंव .फेर नौकरी-चाकरी कोनो जगा परे डरे त नइ हे ना के झटकिन मिल जाय. लाईन म कतको झन खड़े हें. उन तीन-पांच करे म हुशियार हें.

नोंनी बैसखिंन कथे- ‘मेंहा खूब पढ़-लिख डरे हों. नानमुन बुता ल नइ करंव. मेंहा ममा दाई नतनींन, ममा, मामी के दुलौरिन भांची आंव. मोर बर उनकर परेम छ्लकत रहिथें. देखइया मन मोर भाग ल संहराय बिना नइ राहंय. मेंहा सोचेंव कालेज पढ़ डरे हों. कम्प्यूटर सीखे हों. गाँव के लइका मन ल गणित, विज्ञान पढ़ाथों. गाँव के मन मोर ले खुश हें. माँ के बचपना के सुरता करके कथें जइसे दाई हुशियार रिहिस तइसने बेटी घलो हुशियार हे. बिचारी गउ बरोबर सिधवा सब संग गोठियाय फेर न कखरो चारी जाने न चुगली. पढ़ते साठ बिहाव होगे. बड़हर घर गे हे फेर ओखर बेवहार म घमंड नाव के चीज नइ हे. एक दिन मेंहा अपन बचपन के फोटो ल देखत रेहेंव. फोटो कठल-कठल के हाँसत म बाबू हर खींचे रिहिस. फोटो ल देख के ममा दाई किहिस-बेटी मन देखते-देखत म झटकुन बाढ़ जथें. फेर बर-बिहाव के लइक हो जथें. लाड-पियार म कइसे दिन पहा जथे जनाबे नइ करे. अउ ममा दाई फफक-फफक के रो परिस. में केहेंव –‘ममा दाई, मेंहा तोला छोड़ के नइ जावंव ओ. अउ ओखर आंसू ल,पोछेंव. ममा दाई किहिस-बेटी, तोर ले पहिली में हा जाहूं. भगवान मोला तोर बिहाव करे के बाद मोला बलाही. में हां इहाँ तोर बिन नइ रही सकंव् बेटी’. ऐसे कहिके फेर रॉय बर धर लिस. ले दे के ओला चुप करे के कोशीश म महूं रो डरेंव. अस्सी बरस के ममा दाई के बचपन फेर लहुटगे हे. ममा-मामी के संकल्प हे के अपन भांची के बिहाव ल बड़ धूमधाम से कर बोन. बेटी पराया धन होथे. बहुत अकन घटना मन ल बैसखिंन सुरता करत हे.

बैइसाखिंन तीरेच के गाँव म सरकारी स्कूल म मास्टरिंन होगे. लइका मन ओखर बर भगवान बरोबर होगे. मन लगा के पढ़ाय-लिखाय.दिन-बादर जावत का लगथे. इही स्कूल म ओला पांच बरस कइसे बितिस पता नइ चलिस. बैइसाखिंन के बिहाव बलौद (बालोद) साहर म होगे.ओखर घर –गोसंइया घलो बालोद म मास्टर रिहिस. ममा-दाई अउ ममा मन ओखर बिहाव ल धूमधाम से करिन. बैइसाखिंन के बिहाव होय तीन महीना होय रिहिस ममा-दाई शांत हो के सर्ग सिधारगे. बैइसाखिंन धीरे-धीरे अपन दुनिया म व्यस्त होगे. ओखर बाल गोपाल के किलकारी गूंजत रिहिस.

(शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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