छत्तीसगढ़ी म पढ़व- सिंघोला वाली भानेश्वरी देवी उपर लोक आस्था

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जठना म आये दिन मूत डरत रेहेच. बड़ रिसहा तास आजो तोर रिसई ह नई गे हे. अब ए बात ह सोला आना सिरतोन आय जेला दाई ह मोला बतावत हे फेर मोर बर तो ए सब ह किस्सा कहानी हो गे हे. मोरे बर का अइसने सबो बर होगे हे किस्सा कहानी अपन ननपन के बात ह. अइसने किसम के कतको घटना घटे रथे जेन ह सिरतोन तो रथे फेर जादा दिन होय ले किस्सा गोई लागथे.

अइसने एक ठन सिरतोन के घटना ह कहानी कस अब लागथे. जब मय किंदरत-फिरत राजनांदगांव ले बालोद रोड म आठ किलोमीटर दूरिहा म बसे गांव सिंघोला पहुंचेंव त महूं ल उहें के घटना सिरतोन लागिस. काबर कि ओकर सबो सबूत ह मौजूद हे सिवाय भानेश्वरी देवी के. सन् 1915 के बात आय जब बिहनिया सहुअइन दाई के कोख ले भानेश्वरी अवतरिस. भानेश्वरी के ददा सोमनाथ ह छट्ठी मनइस. चोरमार गोत्र के सोमनाथ के तीन झिन बेटी अउ एक झिन बेटा रिहिस जेमा बेटी मन म सबले नान्हें भानेश्वरी रिहिस. भानेश्वरी के भतीजा अनूप ह बतइस कि फूफू ह सुरगी गाँव म बिहाए रिहिस फेर ससुरार नई गे रिहिस. सन् 1927 म भानेश्वरी देवी गियारा साल के रिहिस.

उही साल ओकर उपर शीतला माता ह उदगरिस. गांव म देखो-देखो हो गे. सब अपन-अपन ले सेवा सटका म लग गे. सेऊक मन शीतला म माता पहुंचनी करिन. एकर बाद भी नइ मानिस ताहन तो भानेश्वरी देवी ह कुछ दिन ले शीतला (माता देवाला) म राहत रिहिस. श्रद्धालु मन के सहयोग से भानेश्वरी देवी के रेहे बसे बर शीतला के तीर म घर बनइस. माता जी के हाथ ले भभूत पा के संकट ले उबरे खातिर दूरिहा-दूरिहा ले लोगन पहुंचन लागे. दान पेटी के पइसा ले विशाल मंदिर बनिस जऊन ह देखे के लइक हे. आजो घलो मनोकामना पूर्ति खातिर छत्तीसगढ़नीन माइलोगन मन श्रृंगार के जिनिस चघाथे.

गांव के निस्तारी खातिर बड़े जन तरिया हे. पहिली ए तरिया म अघात काई होवत रिहिस हे तिही पाए के ओला काई तरिया के नाव ले जाने जाथे. छत्तीसगढ़ के हर गांव म शीतला रहिथे अउ शीतला करा लीम पेड़ रहना जरूरी हे. उही किसम ले यहूं के शीतला म लीम पेड़ हे. भानेश्वरी देवी के मंदिर के अउ शीतला के मुहाटी डाहर लोहा के कांटादार झूला हे. उहें सेउक मन बतइन के भानेश्वरी देवी ह रामनम्मी अउ दसेरा पाख म बार के दिन (सोमवार अउ बिरस्पत) के दिन इही कांटादार झूला म पालथी मार के बइठे ताहन बइगा अउ सेउक मिल के माता ल झुन्ना झुलावय.

कांटादार खड़उ पहिर के रेंगय. शीतला के किरपा ले भानेश्वरी देवी ल कुछु नइ होवय. पांच छै सौ छानी वाले गांव सिंघोला ल अब भानेश्वरी देवी के नाव ले जादा जाने बर धर ले हे. देवारी के पहिली बिरस्पत (जउन ह शीतला माता के बार के दिन आय) के दिन भानेश्वरी देवी के मान म मड़ई भराथे. भारी भीड़ रथे. सन् 1975 म भानेश्वरी देवी ह समाधि लिस. कतको कथा तो दंत कथा रहिथे फेर सिंघोला के घटना ह जीता जागता घटना आय. भानेश्वरी देवी के दरसन करे ले कतनो झिन के मनोकामना पुरा होथे. सिंघोला वाली भानेश्वरी देवी की जय हो.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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