छत्तीसगढ़ी म पढ़व- हरियर छत्तीसगढ़ के तिहार हरेली

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तब होही जब अषाढ़ में बांवत (जनम) हरेली बियासी (बिहाव) कोनो भी हालत म निपट जय. तभे तो हरहिन्छा हरेली के दिन गेड़ी खपा के रचरीच-रचरीच मचे जा सकत हे. नई बाजही ते थोकिन माटी तेल रिको दे. किसानी करे बर मांग के अनुसार पानी बरसे बर परही. काबर किसानी कि जीनगी तोर परसादे, अब तो मोर मालिक पानी बरसा दे. अरझे हवे कांटा म परान पानी बिना नइ होवय धान.

तभे तो सियान मन कथे-
सावन म उत्ती ले अऊ भादो म बूढ़ती डाहर ले कहूं पुरवाही चलीस ताहन जान डर अंकाल परे के संभावना जादा हे.
फेर अंकाल के मुख ल देखे बर झन परय. किसानी तो सबके जीवन के आधार आय अऊ किसान मन बर तो सब कुछ आय |

जनम के हम तो नांगर चोत्ता नइ जानन सोरा सतरा , भूरूवा भंइसा तता तता इही हमर बर पोथी पतरा. छत्तीसगढ़ म किसान धान के बोनी के बाद बियासी निपटा के हरेली तिहार मनाथे. तभे तो खेती के औजार नांगर बक्खर, रापा कुदारी, साबर, हंसिया, बसला बिंधना मन ल धो धा के पूजा पाठ करथन. किसान किसानी के काम बूता म फदके के सेती माल मत्ता के उपर घलो खियाल करे के फुरसद नइ राहय. काम बूता म किंधिया जय रथे. तिही पाए के हरेली के दिन गाय गरूआ के सेवा मन लगा के करथे. हरेली के दिन बिहनिया गहूं पिसान ल सान के लोंदी भीतर गड़ा निमक (नून) ल भर के अण्डा पान संग दइहान म खबा के मवेशी मन ल जड़ी बूटी के दवई पियाथन ताकि कोनो किसम के बीमारी ह छू झन सकय. चरवाहा मन मालिक के मुहाटी म लीम के डंगाली खोंच के सबके हरियर तन मन के कामना करथे. लीम के डारा ह जुड़वास के प्रतीक घलो आय .

आए हरेली माने ल फागुन, पथरा म बइठ के लगा ले साबुन. साबुन म नहा खोर के लोहार मन नान नान खीला के पाती बना के बांवत बियासी निपट गे कहि के लकड़ी के चौखट म ठोंकथे. हरेली के दिन ले रोटी पीठा मन घलो चकल-बकल करे ल धर लेथे.

जवनहा मन के संग ताहन बाजे मिरदंग अऊ सियनहा मन के संग ताहन चोंगी माखुर के तंग. तंग काबर नइ होही जी सियान मन तो रामधुन, भजन कीर्तन अऊ आल्हा रामायण म व्यस्त रथे. बाबू मन सुर, कबड्डी म मगन रथे त नोनी मन फुगड़ी, खो-खो अउ बिल्लस के गाला ल पुकोवत रथे. हरेली तिहार धार्मिक तिहार के संगे संग समाजिक तिहार घलो आय.

छत्तीसगढ़ म सावन अमावस ल भले हरेली तिहार के रूप म जाने जाथे बल्कि पूरा भारत वर्ष म ए दिन ल हरियाली के स्थापना पर्व के रूप म जाने जा सकत हे.

आज के समे म हरेली तिहार ल समाजिक वानिकी नही ते पर्यावरण संरक्षण तिहार कहि सकथन. आगु जमाना म तो पूरा छत्तीसगढ़ जंगल झाड़ी म तोपाए रिहिस. मनखे मन अपन सोहिलियत के मुताबिक रूख राई ल काटिन. बाद म कृषि युग म खेती बारी खातिर जंगल झाड़ी ल मनमाने उजारे ल धर लिन. अब तो लकड़ी के कमी के सेती लोहा ले जादा मांहगी हो गे हे.साल – साइगोना लकड़ी तो नोहर हो गे हे. इहां तक ले जंगल ले जल अऊ जल ले जीवन कम पानी के गीरे ले प्रभावित हो गे हे. यदि सुखी रहना हे त सबो लइका के नाव ले एक-एक पेड़ लगा के हरेली तिहार के उद्देश्य ल पूरा करन.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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